बालश्रमिको, बालअपराधियो का सामाजिक आर्थिक समस्याओ का समाजशास्त्रीय अध्ययन (जिला- बिलासपुर के रेलवे प्लेटफार्म के विशेष संदर्भ मे)
Dr. Vrinda Sengupta, Dr. S.K. Agrawal
Assistant Professor (Sociology), T.C.L.G. Post Graduate College Janjgir [C.G]
Principal, T.C.L. G.Post Graduate College Janjgir [C.G]
*Corresponding Author E-mail:
सारांश:
प्रस्तुत शोधपत्र बालश्रम एवं बाल अपराध के सामाजिक आर्थिक पृष्टभूमि एवं उन्मूलन के प्रयासो पर आधारित है। प्रत्येक बालक का यह मौलिक अधिकार है कि सामाजिक एवं मानसिक विकास हेतु उत्तम सुविधाए़ दे बच्चो की शिक्षा की उपेक्षा करके उनसे ऐसा काम करवाया जाये जो उनके लिए जोखिम बन जाये एवं उनके द्वारा जाने या अनजाने मे अपराधिक कृत्य किया जाना। उनके शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक स्वास्थ्य पर कुप्रभाव डाले, तो यह बालश्रम है। अंतराष्ट्रीय बाल श्रम संगठन 1988 के अनुसार खेल की अवस्था में बच्चो से वयस्कों जैसे कार्य करवाना कम मजदूरी के लिए लंबे समय तक ऐसे कार्य कराना जिनसे शारीरिक मानसिक क्षति पहुंचे एवं बाल अपराध के अंतर्गत वे अपराध आते है जो एक निश्ति आयु समूह के भीतर के बालको या किशोरो द्वारा किसी विधि कानून का उल्लंघन करने पर पारित होते है। यह अपराध गंभीर किस्म का भी हो सकता है। हमारे यहां बाल अपराधियो को बाल सुधार गृह भेजा जाता है न कि कारागार।
बालश्रमिको के कार्य की प्रस्तुति संगठित एवं असंगठित दोनो क्षेत्रो में होती है। एवं बाल अपराधियो द्वारा किये जाने वाले अपराधिक कृत्य इस प्रकार है। जैसे- घर से भाग जाना, आवारापन करना, दूसरो को चोट पहुंचाना, गलत लोगो की संगति, स्कूल से भाग जाना, बिना कारण घर से अनुपस्थित रहना, अनैतिक आचरण मे संलग्न रहना। असामाजिक आचरण करना जुआ घरो एवं वैश्यालयो मंे जाना, बस अड्डो व रेलवे स्टेशनो बिना किसी उद्देश्य से घूमना, नशीली पदार्थो बिक्री करने वालो स्थानो पर घूमना, खतरनाक ब्यवसायो या कामो मे संलग्न होना, तम्बाखू सिगरेट आदि का प्रयोग करना, अपराधिक योजनायें बनाना, शराब का सेवन करना, पार्को एवं फुटपातो में रात गुजारना, नशे की हालत मंे गाड़ी चलाना, अनैतिक यौनाचर मंे संलग्न रहना। लघु शोध परियोजनाओ का उद्देश्य बालश्रम एवं बाल अपराधियो के सामाजिक आर्थिक दशाओ का अघ्ययन करते हुए उनके उनमूलन का प्रयास कर उसे राष्ट्रीय परिप्रक्ष्य मंे देखना। उन कारणो की खोज करना जिनके कारण बालको को श्रम करना एवं आपराधिक कृत्य करने के लिए बाध्य होना पड़ा।
अध्ययन से प्रात्त निष्कर्ष आधिकांशतः बालश्रम एवं बाल अपराधी बनने का कारण मुख्यतः परिवार की गरीबी, जनसंख्या की अधिकता, अशिक्षा, बेरोजगारी, त्रण की भरपाई, प्राकृतिक आपदा, पलायन एवं अन्य कारणो से बच्चे श्रम से जुडे़ है। जिनका निदान राष्ट्रीय स्तर पर, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करने की आवश्यकता है।
शब्दकुंजी: बालकानून, बंधुआ मजदूरी, बालश्रम, अशिक्षा, बालअपराधश् गरीबी।
मानवता एक ईश्वरी गुण है जो प्रत्येक मानव मंे होना आवश्यक नही कि “मानवता का प्रयोग संपन्न ब्यक्ति ही करते है, अपितु किसी भी सामान्य ब्यक्ति का अप्रेक्षित गुण है। “संविधान मे शोषण के विरू़द्ध अधिकार“ (अनु,23/24 मे वर्णित) हमारे समाज मंे अन्याय का मुकाबला किया जाता रहा है, तथा शोषण व अन्याय के लिए कोई स्थान नही है अनुच्छेद, 23 एवं 24 इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है। अनुच्छेद 23 का मानव का दुर्वयापार, बेगार तथा इसी प्रकार के अन्य जबरजस्ती लिये जाने वाले श्रम को प्रतिबद्ध करता ह। यह अनुच्छेद उक्त उपबन्ध के किसी उल्लंघन को एक दंडनीय अपराध घोषित करता है अनुच्छेद-24 को बालक को संकटपूर्ण नियोजन मंे लगाने का प्रतिशेष- (अनुच्छेद 24) 14 वर्ष से कम आयु के बालको को किसी कारखाने या किसी अन्य जोखिम भरे कार्यो का प्रतिषेध करता है, इस अनुच्छेद का उद्देश्य कम आयु के बच्चो के स्वास्थ्य की रक्षा करना है वस्तुतः बच्चे देश के भावी नागरीक है।
1, “बच्चो से तात्पर्य उस बच्चो से है जिसने अपने आयु का 14 वर्ष पूरा नही किया है। “
अध्ययन की प्रकृति:
ब्यक्ति और समाज का अटूट संबंध है इनमे किसी एक के बिना दूसरे की कल्पना नही की जा सकती ह। इलियट तथा मैरिल ने इसीलिए कहा है कि ंब्यक्ति अत्यंत विशाल समाज का एक सूक्ष्म रूप है समाज और एकांकी ब्यवस्था नही है प्रत्येक समाज मे अच्छे और बुरे दोनो प्रकार के तत्व विघमान रहते है इसमें अच्छे तत्व समाज को संगठित करते है। वही बुरे तत्व समाज को विघटन की ओर ले जाता है।
दूसरे शब्दो मंे सामाजिक संगठन को दृष्टि मंे रखते हुए ब्यक्तियों को दो वर्गो मे सामाजिक और समाज विरोधी रखा जा सकता है। यही समाज विरोधी तत्व जब सामाजिक संरचना और उसकी ब्यवस्था के विपरीत कार्य करते है जब अपराध और श्रम का जन्म होता है। सामाजिक संरचना मंे समाज की विभिन्न संस्थाओ मंे पारस्परिक संबंधियो, सामाजिक स्थिति और कार्यो की एक निश्चित ब्यवस्था रहती है जब इस ब्यवस्था के विपरित कार्य होता है तब उसे हम सामाजिक विघटन कहते है, ए,के,कोहेन।
मनोवैज्ञानिक तत्व:
मनोवैज्ञानिक बालअपराध और अपराध को ब्यक्तिगत मानते हुए अनेक तत्वो का वर्णन करते है मनोवैज्ञानिक कारक भौतिक दशाओ के साथ मिले होते है। स्वास्थ्य की स्थिति और शारीरिक अपंगता ब्यक्ति के मानसिक और भावनात्मक क्रियाओ को प्रभावित करती है और मन की उलझन ब्यक्ति के भौतिक क्रियाकलापो को बिगाड़ देता ह। ब्यक्ति के सोंचने, महसूस करने और कार्य करने की प्रक्रिया इनसे प्रभावित होती है और ब्यक्ति इस तरह असमान्य कार्य कर बैठता है। इस तरह यह मनोवैज्ञानिक तत्व बाल अपराधियो मंे मानसिक दोष उत्पन्न कर देता है। मनोवैज्ञानिक यह भी मानते है कि बाल अपराधियो का संबंध मानसिक ़रूप से कम विकास या अधिक विकास, भावनात्मक अनियंत्रण मानसिक दोष आदि से भी है।
1, बालक से तात्पर्य उस अवस्था या आयु से है जिसके तहत् बालक को उसके शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए संरक्षण आवश्यक है, जब तक की वह स्वतं़त्र रूप से वयस्क के समरूप न हो जाए।
2, पीपुल्स युनियन फाॅर डेमोक्रेटिक राईट्स बनाम भारत राज्य, ए,आई,आर 1982, सु, को 1473
स्ंाबधित साहित्य की समीक्षा:
बालश्रम बालअपराध पर पूर्व मंे जो अध्ययन हुए है उनमे निम्नलिखित उल्लेख है
ऽ कोठारी स्मृति 1983- बालश्रमिको बालअपराधियो के कार्य करने का वातावरण सामान्यतः डरावना, सेकरा, जर्जर छत तथा वास्तविक रूप मंे खतरनाक परिस्थियो के साथ घुटन भरा होता है।
ऽ बुर्रा, नीरा 1986- ने अपने शोधो के माध्यम से बताया है कि बाल मजदूरी की ब्यापकता अशिक्षा है
ऽ टैरथब जी, अशोक 1987- ने अपने शोधो मंे पाया है कि बालश्रमिको के धरेलू उधोग के उत्पादन लागत को कम करने हेतु और प्रतिस्पर्धा मूल्य बनाने और परिवार के आय बढ़ाने हेतु प्रोत्साहित किया जाता है।
परिकल्पना :
ऽ प्रायः बालश्रमिको, बालअपराधियाॅ थे एवं सामाजिक
ऽ स्तर निम्न होते है।
ऽ आर्थिक स्थिति भी दयनीय होती हैा
ऽ प्रायः अशिक्षित होते हैा
ऽ प्रायः अभावग्रस्त होते है ।
उददेश्य:
ऽ बालश्रमिको की समस्या का निदान करना।
ऽ बालश्रमिको एवं बाल अपराधियो को शिक्षित कर उन्हे रोजगार के लिए जागरूक करना।
ऽ उनके आर्थिक समस्या का निदान कर उन्हे समाज के मुख्य धारा से जोड़ना।
बालश्रम, अपचार कोई अलग-अलग समस्या नही है। इससे वर्तमान सामाजिक समस्याओ के पृष्ठभूमि मंे ही समझा जा सकता है। विगत काल से हो रहे अनेकानेक सामाजिक परिवर्तन का प्रभाव पड़ा है आज के समाज के सामाजिक समस्याओ की जड़े भूतकाल से है। और जिनका वर्तमान और भावी स्वरूप उसका परिणाम है। किसी भी समस्या का गहन अध्ययन किये बिना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझे और उस समस्या के मौलिक कारको को जाने बगैर नही किया जा सकता है। समस्या के परिस्थितियो का ज्ञान भी आवश्यक है और तभी उसके उपचार के दिशा मे सोंचा जा सकता है। इस तरह किसी समस्या के उपचार के ज्ञान के लिए संबंधित सामाजिक ब्यवस्था का गहन अध्ययन आवश्यक होता है सामाजिक समस्याओं में संस्कृति की निरंतरता और वर्तमान समाज मंे हो रहे लगातार परिवर्तन दोनो का प्रभाव पड़ता है यदि सामाजिक ब्यवस्था मे हो रहे परिवर्तनों की गति धीमी हो और इन परिवर्तनो का समाज के प्रत्येक अंग के विकास मे बराबर का प्रभाव पड़ता है तब इन दशाओ मे सामाजिक विघटन का प्रभाव बहुत कम परिलक्षित होता है वास्तव मे समस्याओ का जन्म मुख्य रूप से तेज या असामान्य परिवर्तनो से होता है, जिनसे समय के बदलते हुए परिवेश मंे पर्याप्त सामाजिक सामंजस्य नही रह पाता और उनसे उत्पन्न होने वाले कारणो पर नियंत्रण नही हो पाता है।
भारतीय दंड संहिता एवं अधिनियम के अंतर्गत-
वर्ष बल अपचारी योग बालिकाओ काप्रतिशत
बाल अपराध ध् कुल अपराध
1981 181888 8679 190567 4.6
1982 157664 10673 168337 6.3
1983 160543 11101 171614 6.5
1984 149755 12505 162260 7.7
1985 157107 11392 168499 6.8
1986 159977 10172 170149 6.0
1987 166407 13555 179962 7.5
1988 33065 5103 38168 13.4
1989 24777 11615 36392 31.9
1990 25269 5547 30816 18.0
1991 23201 6390 29591 21.6
1992 17474 3884 21358 18.2
1993 16391 3676 20067 18.3
उरोक्त तालिका एवं ग्राफ से निम्न तथ्य प्रकट होते है-
1. बाल अपचारियो मंे बालिकाओ का प्रतिशत 1989 में सर्वाधिक है 31,9 प्रतिशत पाया गया है।
2. बाल अपचारियो की संख्या मंे उतार चढ़ाव रहा है। इस अवधी की सर्वाधिक संख्या 1981 में 190567 पायी गयी है।
3. 1981 से 1987 के बीच बाल अपराधियो की न्यूनतम संख्या 1984 में 162260 और 1988,1990 के बीच 1990 मे 30816 पायी गई है।
4. 1989 से 1993 कि बीच बाल अपचारियों की न्यूनतम संख्या 1993 मंे 20067 (16391 बालक एवं 3676 बालिकायें) पायी गयी है।
सुझाव:
ऽ बालश्रमिको को फ्री मंे शिक्षा दी जानी चाहिए।
ऽ माता पिता के रोजगार की ब्यवस्था की जानी चाहिए।
ऽ शासन के द्वारा उनकी शिक्षा, आवास, एवं रोजगार की ब्यवस्था करना चाहिए।
निष्कर्ष:
प्रस्तुत शोधपत्र मे बालश्रमिक, बालअपाधियो थे समा शास्त्रीय अध्ययन करने से पाया गया कि प्रायः बालश्रमिक बालअपराध अशिक्षित होते है एवं उनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर होती है । पैसे के अभाव में वे अपराधिक कृत्य करने को मजबूर हो जाते है और उनकी दिन चर्चा यहाॅ वहाॅ घुम कर ब्यतीत करते हौ जिन्हे उनके समस्या को हल कर समाज की मुख्य धारा से जोड़ना है।
संदर्भ सूची -
ऽ अग्रवाल आभा- चाईल्ड लेबर ईन ग्लास इंडस्ट्री श्रम मंत्रालय भारत सरकार 1998।
ऽ आहूजा राम 2006- सामाजिक समस्याएं, रावत पब्लिकेशन, जयपुर एवं नई दिल्ली ।
ऽ बघेल, डी0एम0 अपराधशास्त्र विवेक प्रकाशन, जवाहर नगर, दिल्ली।
ऽ बादीवाला, मितेरा 1998- भारत मे बालश्रमिक कारण, सरकारी नीति और शिक्षा की भूमिका।
ऽ बुर्रा नीरा- बार्नटू बर्न चाईल्ड लेबर इन इंडिया 1947, आम्सफोर्ड यूनिवसिटी प्रेस।
1. योजना- नवम्बर 1997, अप्रैल 98, दिसम्बर 99, जनवरी 02, मार्च 03, अगस्त 06।
2. कुरूक्षेत्र- अप्रैल 2004, अप्रैल 2005, सितम्बर 05, जुलाई 08, फरवरी 09, अप्रैल 13, जुलाई 13।
3. उधोग ब्यापार पत्रीका- अक्टूबर 05, दिसम्बर 09, अप्रैल 10, जनवरी 11, मई 13, जुलाई 13।
Received on 27.12.2016 Modified on 05.05.2017
Accepted on 11.06.2017 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences. 2017; 5(2):65-68.